श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

एतद्वै श्रद्धया भक्‍त्या योगाभ्यासेन नित्यशः।

समाहितात्मा निःसङ्गो विरक्‍त्या परिपश्यति॥ ३०

etadvai śraddhayā bhaktyā yogābhyāsena nityaśaḥ|

samāhitātmā niḥsaṅgo viraktyā paripaśyati|| 30

अर्थ

किन्तु इसे ब्रह्मरूप वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तरके योगाभ्यासके द्वारा एकाग्रचित्त और असंगबुद्धि हो गया है॥ ३०॥

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