किन्तु इसे ब्रह्मरूप वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तरके योगाभ्यासके द्वारा एकाग्रचित्त और असंगबुद्धि हो गया है॥ ३०॥
एतद्वै श्रद्धया भक्त्या योगाभ्यासेन नित्यशः।
समाहितात्मा निःसङ्गो विरक्त्या परिपश्यति॥ ३०
किन्तु इसे ब्रह्मरूप वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तरके योगाभ्यासके द्वारा एकाग्रचित्त और असंगबुद्धि हो गया है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 398) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/32/30/