श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

क्रियया क्रतुभिर्दानैस्तपःस्वाध्यायमर्शनैः१।

आत्मेन्द्रियजयेनापि संन्यासेन च कर्मणाम्॥ ३४

kriyayā kratubhirdānaistapaḥsvādhyāyamarśanaiḥ|

ātmendriyajayenāpi saṃnyāsena ca karmaṇām|| 34

अर्थ

नाना प्रकारके कर्मकलाप, यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन, वेदविचार (मीमांसा), मन और इन्द्रियोंके संयम, कर्मोंके त्याग, विविध अंगोंवाले योग, भक्तियोग, निवृत्ति और प्रवृत्तिरूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकारके धर्म, आत्मतत्त्वके ज्ञान और दृढ़ वैराग्य—इन सभी साधनोंसे सगुण-निर्गुणरूप स्वयंप्रकाश भगवान्‌को ही प्राप्त किया जाता है॥ ३४—३६॥✎ 349

यह अर्थ श्लोक 34–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—दर्शनैः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 399)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #349 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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