॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.37
प्रावोचं भक्तियोगस्य स्वरूपं ते चतुर्विधम्।
कालस्य चाव्यक्तगतेर्योऽन्तर्धावति जन्तुषु॥ ३७
prāvocaṃ bhaktiyogasya svarūpaṃ te caturvidham|
kālasya cāvyaktagateryo'ntardhāvati jantuṣu|| 37
अर्थ
माताजी! सात्त्विक, राजस, तामस और निर्गुण-भेदसे चार प्रकारके भक्तियोगका और जो प्राणियोंके जन्मादि विकारोंका हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस कालका स्वरूप मैं तुमसे कह ही चुका हूँ॥ ३७॥✎ 1313