श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम्।

निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रियः॥ ४२

bahirjātavirāgāya śāntacittāya dīyatām|

nirmatsarāya śucaye yasyāhaṃ preyasāṃ priyaḥ|| 42

अर्थ

जो अत्यन्त श्रद्धालु, भक्त, विनयी, दूसरोंके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाला, सब प्राणियोंसे मित्रता रखनेवाला, गुरुसेवामें तत्पर, बाह्य विषयोंमें अनासक्त, शान्तचित्त, मत्सरशून्य और पवित्रचित्त हो तथा मुझे परम प्रियतम माननेवाला हो, उसे इसका अवश्य उपदेश करे॥ ४१-४२॥

यह अर्थ श्लोक 41–42 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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