॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.42
बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम्।
निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रियः॥ ४२
bahirjātavirāgāya śāntacittāya dīyatām|
nirmatsarāya śucaye yasyāhaṃ preyasāṃ priyaḥ|| 42
अर्थ
जो अत्यन्त श्रद्धालु, भक्त, विनयी, दूसरोंके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाला, सब प्राणियोंसे मित्रता रखनेवाला, गुरुसेवामें तत्पर, बाह्य विषयोंमें अनासक्त, शान्तचित्त, मत्सरशून्य और पवित्रचित्त हो तथा मुझे परम प्रियतम माननेवाला हो, उसे इसका अवश्य उपदेश करे॥ ४१-४२॥