वे अन्तमें सूर्यमार्ग (अर्चिमार्ग या देवयान)-के द्वारा सर्वव्यापी पूर्णपुरुष श्रीहरिको ही प्राप्त होते हैं—जो कार्य-कारणरूप जगत्के नियन्ता, संसारके उपादान-कारण और उसकी उत्पत्ति, पालन एवं संहार करनेवाले हैं॥ ७॥✎ 345346
सूर्यद्वारेण ते यान्ति पुरुषं विश्वतोमुखम्।
परावरेशं प्रकृतिमस्योत्पत्त्यन्तभावनम्॥ ७
वे अन्तमें सूर्यमार्ग (अर्चिमार्ग या देवयान)-के द्वारा सर्वव्यापी पूर्णपुरुष श्रीहरिको ही प्राप्त होते हैं—जो कार्य-कारणरूप जगत्के नियन्ता, संसारके उपादान-कारण और उसकी उत्पत्ति, पालन एवं संहार करनेवाले हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 396) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/32/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#345 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में