श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

ध्यायती भगवद्रूपं यदाह ध्यानगोचरम्।

सुतः प्रसन्‍नवदनं समस्तव्यस्तचिन्तया॥ २३

dhyāyatī bhagavadrūpaṃ yadāha dhyānagocaram|

sutaḥ prasannavadanaṃ samastavyastacintayā|| 23

अर्थ

फिर वे, कपिलदेवजीने भगवान्‌के जिस ध्यान करनेयोग्य प्रसन्‍नवदनारविन्दयुक्त स्वरूपका वर्णन किया था, उसके एक-एक अवयवका तथा उस समग्र रूपका भी चिन्तन करती हुई ध्यानमें तत्पर हो गयीं॥ २३॥✎ 1989

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1989 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यथोचित्त → यथोचित

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