श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

एवं सा कपिलोक्तेन मार्गेणाचिरतः परम्।

आत्मानं ब्रह्म निर्वाणं भगवन्तमवाप ह॥ ३०

evaṃ sā kapiloktena mārgeṇācirataḥ param|

ātmānaṃ brahma nirvāṇaṃ bhagavantamavāpa ha|| 30

अर्थ

विदुरजी! इस प्रकार देवहूतिजीने कपिलदेवजीके बताये हुए मार्गद्वारा थोड़े ही समयमें नित्यमुक्त परमात्मस्वरूप श्रीभगवान्‌को प्राप्त कर लिया॥ ३०॥✎ 352

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #352 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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