श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

यन्‍नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद्

यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्‍वचित्।

श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते

कुतः पुनस्ते भगवन्‍नु दर्शनात्॥ ६

yannāmadheyaśravaṇānukīrtanād

yatprahvaṇādyatsmaraṇādapi kvacit|

śvādo'pi sadyaḥ savanāya kalpate

kutaḥ punaste bhagavannu darśanāt|| 6

अर्थ

भगवन्! आपके नामोंका श्रवण या कीर्तन करनेसे तथा भूले-भटके कभी-कभी आपका वन्दन या स्मरण करनेसे ही कुत्तेका मांस खानेवाला चाण्डाल भी सोमयाजी ब्राह्मणके समान पूजनीय हो सकता है; फिर आपका दर्शन करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाय—इसमें तो कहना ही क्या है॥ ६॥

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