मैत्रेय मुनि भगवान्के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभावसे उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरिने प्रेम एवं मुसकानयुक्त चितवनसे मुझे आनन्दित करते हुए कहा॥ १०॥
तस्यानुरक्तस्य मुनेर्मुकुन्दः
प्रमोदभावानतकन्धरस्य ।
आशृण्वतो मामनुरागहास-
समीक्षया विश्रमयन्नुवाच॥ १०
मैत्रेय मुनि भगवान्के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभावसे उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरिने प्रेम एवं मुसकानयुक्त चितवनसे मुझे आनन्दित करते हुए कहा॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 249) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/4/10/