श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स एष साधो चरमो भवाना-

मासादितस्ते मदनुग्रहो यत्।

यन्मां नृलोकान् रह उत्सृजन्तं

दिष्ट्या ददृश्वान् विशदानुवृत्त्या॥ १२

sa eṣa sādho caramo bhavānā-

māsāditaste madanugraho yat|

yanmāṃ nṛlokān raha utsṛjantaṃ

diṣṭyā dadṛśvān viśadānuvṛttyā|| 12

अर्थ

साधुस्वभाव उद्धव! संसारमें तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है; क्योंकि इसमें तुमने मेरा अनुग्रह प्राप्त कर लिया है। अब मैं मर्त्यलोकको छोड़कर अपने धाममें जाना चाहता हूँ। इस समय यहाँ एकान्तमें तुमने अपनी अनन्य भक्तिके कारण ही मेरा दर्शन पाया है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ १२॥

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