विदुरजी! इससे यद्यपि मैं उनका आशय समझ गया था, तो भी स्वामीके चरणोंका वियोग न सह सकनेके कारण मैं उनके पीछे-पीछे प्रभासक्षेत्रमें पहुँच गया॥ ५॥
अथापि तदभिप्रेतं जानन्नहमरिन्दम।
पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः॥ ५
विदुरजी! इससे यद्यपि मैं उनका आशय समझ गया था, तो भी स्वामीके चरणोंका वियोग न सह सकनेके कारण मैं उनके पीछे-पीछे प्रभासक्षेत्रमें पहुँच गया॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 249) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/4/5/