श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परमज्ञानी मैत्रेय मुनि (हरिद्वारक्षेत्रमें) विराजमान थे। भगवद्भक्तिसे शुद्ध हुए हृदयवाले विदुरजी उनके पास जा पहुँचे और उनके साधुस्वभावसे आप्यायित होकर उन्होंने पूछा॥ १॥✎ 1299
द्वारि द्युनद्या ऋषभः कुरूणां
मैत्रेयमासीनमगाधबोधम् ।
क्षत्तोपसृत्याच्युतभावशुद्धः
पप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्तः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परमज्ञानी मैत्रेय मुनि (हरिद्वारक्षेत्रमें) विराजमान थे। भगवद्भक्तिसे शुद्ध हुए हृदयवाले विदुरजी उनके पास जा पहुँचे और उनके साधुस्वभावसे आप्यायित होकर उन्होंने पूछा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 253) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1299 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): साधु-स्वभावसे → साधुस्वभावसे