श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कस्तृप्नुयात्तीर्थपदोऽभिधानात्

सत्रेषु वः सूरिभिरीड्यमानात्।

यः कर्णनाडीं पुरुषस्य यातो

भवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति॥ ११

kastṛpnuyāttīrthapado'bhidhānāt

satreṣu vaḥ sūribhirīḍyamānāt|

yaḥ karṇanāḍīṃ puruṣasya yāto

bhavapradāṃ geharatiṃ chinatti|| 11

अर्थ

उन तीर्थपाद श्रीहरिके गुणानुवादसे तृप्त हो भी कौन सकता है। उनका तो नारदादि महात्मागण भी आप-जैसे साधुओंके समाजमें कीर्तन करते हैं तथा जब ये मनुष्योंके कर्णरन्ध्रोंमें प्रवेश करते हैं, तब उनकी संसारचक्रमें डालनेवाली घर-गृहस्थीकी आसक्तिको काट डालते हैं॥ ११॥✎ 209 1585 1586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

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