विदुरजी! इन आकाशादि भूतोंमेंसे जो-जो भूत पीछे-पीछे उत्पन्न हुए हैं, उनमें क्रमशः अपने पूर्व-पूर्व भूतोंके गुण भी अनुगत समझने चाहिये॥ ३६॥✎ 215
भूतानां नभआदीनां यद्यद्भव्यावरावरम्।
तेषां परानुसंसर्गाद्यथासंख्यं गुणान् विदुः॥ ३६
विदुरजी! इन आकाशादि भूतोंमेंसे जो-जो भूत पीछे-पीछे उत्पन्न हुए हैं, उनमें क्रमशः अपने पूर्व-पूर्व भूतोंके गुण भी अनुगत समझने चाहिये॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 257) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/5/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)