श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तत्साधुवर्यादिश वर्त्म शं नः

संराधितो भगवान् येन पुंसाम्।

हृदि स्थितो यच्छति भक्तिपूते

ज्ञानं सतत्त्वाधिगमं पुराणम्॥ ४

tatsādhuvaryādiśa vartma śaṃ naḥ

saṃrādhito bhagavān yena puṃsām|

hṛdi sthito yacchati bhaktipūte

jñānaṃ satattvādhigamaṃ purāṇam|| 4

अर्थ

साधुशिरोमणे! आप मुझे उस शान्तिप्रद साधनका उपदेश दीजिये, जिसके अनुसार आराधना करनेसे भगवान् अपने भक्तोंके भक्तिपूत हृदयमें आकर विराजमान हो जाते हैं और अपने स्वरूपका अपरोक्ष अनुभव करानेवाला सनातन ज्ञान प्रदान करते हैं॥ ४॥

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