श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.41

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यच्छ्रद्धया श्रुतवत्या च भक्‍त्या

संमृज्यमाने हृदयेऽवधाय।

ज्ञानेन वैराग्यबलेन धीरा

व्रजेम तत्तेऽङ्‌घ्रिसरोजपीठम्॥ ४१

yacchraddhayā śrutavatyā ca bhaktyā

saṃmṛjyamāne hṛdaye'vadhāya|

jñānena vairāgyabalena dhīrā

vrajema tatte'ṅghrisarojapīṭham|| 41

अर्थ

हम आपके चरणकमलोंकी उस चौकीका आश्रय ग्रहण करते हैं, जिसे भक्तजन श्रद्धा और श्रवण-कीर्तनादिरूप भक्तिसे परिमार्जित अन्तःकरणमें धारण करके वैराग्यपुष्ट ज्ञानके द्वारा परम धीर हो जाते हैं॥ ४१॥

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