श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तान् वै ह्यसद‍्वृत्तिभिरक्षिभिर्ये

पराहृतान्तर्मनसः परेश।

अथो न पश्यन्त्युरुगाय नूनं

ये ते पदन्यासविलासलक्ष्म्याः॥ ४४

tān vai hyasadvṛttibhirakṣibhirye

parāhṛtāntarmanasaḥ pareśa|

atho na paśyantyurugāya nūnaṃ

ye te padanyāsavilāsalakṣmyāḥ|| 44

अर्थ

परम यशस्वी परमेश्‍वर! इन्द्रियोंके विषयाभिमुख रहनेके कारण जिनका मन सर्वदा बाहर ही भटका करता है, वे पामरलोग आपके विलासपूर्ण पादविन्यासकी शोभाके विशेषज्ञ भक्तजनोंका दर्शन नहीं कर पाते; इसीसे वे आपके चरणोंसे दूर रहते हैं॥ ४४॥

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