श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

निर्भिन्‍नं तालु वरुणो लोकपालोऽविशद्धरेः।

जिह्वयांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते॥ १३

nirbhinnaṃ tālu varuṇo lokapālo'viśaddhareḥ|

jihvayāṃśena ca rasaṃ yayāsau pratipadyate|| 13

अर्थ

फिर विराट् पुरुषके तालु उत्पन्‍न हुआ; उसमें लोक-पाल वरुण अपने अंश रसनेन्द्रियके सहित स्थित हुआ, जिससे जीव रस ग्रहण करता है॥ १३॥✎ 220

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें