इसी प्रकार जब उस विराट् देहमें आँखें प्रकट हुईं, तब उनमें अपने अंश नेत्रेन्द्रियके सहित—लोकपति सूर्यने प्रवेश किया, जिस नेत्रेन्द्रियसे पुरुषको विविध रूपोंका ज्ञान होता है॥ १५॥✎ 220
निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः।
चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत्॥ १५
इसी प्रकार जब उस विराट् देहमें आँखें प्रकट हुईं, तब उनमें अपने अंश नेत्रेन्द्रियके सहित—लोकपति सूर्यने प्रवेश किया, जिस नेत्रेन्द्रियसे पुरुषको विविध रूपोंका ज्ञान होता है॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने