जब इसके कर्णछिद्र प्रकट हुए, तब उनमें अपने अंश श्रवणेन्द्रियके सहित दिशाओंने प्रवेश किया, जिस श्रवणेन्द्रियसे जीवको शब्दका ज्ञान होता है॥ १७॥✎ 220
कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः।
श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते॥ १७
जब इसके कर्णछिद्र प्रकट हुए, तब उनमें अपने अंश श्रवणेन्द्रियके सहित दिशाओंने प्रवेश किया, जिस श्रवणेन्द्रियसे जीवको शब्दका ज्ञान होता है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने