श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः।

यो जातस्त्रायते वर्णान् पौरुषः कण्टकक्षतात्॥ ३१

bāhubhyo'vartata kṣatraṃ kṣatriyastadanuvrataḥ|

yo jātastrāyate varṇān pauruṣaḥ kaṇṭakakṣatāt|| 31

अर्थ

उनकी भुजाओंसे क्षत्रियवृत्ति और उसका अवलम्बन करनेवाला क्षत्रिय वर्ण उत्पन्‍न हुआ, जो विराट् भगवान्‌का अंश होनेके कारण जन्म लेकर सब वर्णोंकी चोर आदिके उपद्रवोंसे रक्षा करता है॥ ३१॥✎ 221

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #221 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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