श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एते वर्णाः स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम्।

श्रद्धयाऽऽत्मविशुद्ध्यर्थं यज्जाताः सह वृत्तिभिः॥ ३४

ete varṇāḥ svadharmeṇa yajanti svaguruṃ harim|

śraddhayā''tmaviśuddhyarthaṃ yajjātāḥ saha vṛttibhiḥ|| 34

अर्थ

ये चारों वर्ण अपनी-अपनी वृत्तियोंके सहित जिनसे उत्पन्‍न हुए हैं, उन अपने गुरु श्रीहरिका अपने-अपने धर्मोंसे चित्तशुद्धिके लिये श्रद्धापूर्वक पूजन करते हैं॥ ३४॥✎ 222 223 224 225

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #223 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #224 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #225 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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