श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यदर्थेन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्ययः।

प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः॥ १०

yadarthena vināmuṣya puṃsa ātmaviparyayaḥ|

pratīyata upadraṣṭuḥ svaśiraśchedanādikaḥ|| 10

अर्थ

जिस प्रकार स्वप्न देखनेवाले पुरुषको अपना सिर कटना आदि व्यापार न होनेपर भी अज्ञानके कारण सत्यवत् भासते हैं, उसी प्रकार इस जीवको बन्धनादि न होते हुए भी अज्ञानवश भास रहे हैं॥ १०॥✎ 227

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #227 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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