श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वर्णाश्रमविभागांश्‍च रूपशीलस्वभावतः।

ऋषीणां जन्मकर्मादि वेदस्य च विकर्षणम्॥ २९

varṇāśramavibhāgāṃśca rūpaśīlasvabhāvataḥ|

ṛṣīṇāṃ janmakarmādi vedasya ca vikarṣaṇam|| 29

अर्थ

वेष, आचरण और स्वभावके अनुसार वर्णाश्रमका विभाग, ऋषियोंके जन्म-कर्मादि, वेदोंका विभाग, यज्ञोंका विस्तार, योगका मार्ग, ज्ञानमार्ग और उसका साधन सांख्यमार्ग तथा भगवान्‌के कहे हुए नारदपांचरात्र आदि तन्त्रशास्त्र, विभिन्‍न पाखण्डमार्गोंके प्रचारसे होनेवाली विषमता, नीचवर्णके पुरुषसे उच्चवर्णकी स्त्रीमें होनेवाली सन्तानोंके प्रकार तथा भिन्‍न-भिन्‍न गुण और कर्मोंके कारण जीवकी जैसी और जितनी गतियाँ होती हैं, वे सब हमें सुनाइये॥ २९—३१॥

यह अर्थ श्लोक 29–31 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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