॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.7.32
धर्मार्थकाममोक्षाणां निमित्तान्यविरोधतः।
वार्ताया दण्डनीतेश्च श्रुतस्य च विधिं पृथक्॥ ३२
dharmārthakāmamokṣāṇāṃ nimittānyavirodhataḥ|
vārtāyā daṇḍanīteśca śrutasya ca vidhiṃ pṛthak|| 32
अर्थ
ब्रह्मन्! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके परस्पर अविरोधी साधनोंका, वाणिज्य, दण्डनीति और शास्त्रश्रवणकी विधियोंका, श्राद्धकी विधिका, पितृगणोंकी सृष्टिका तथा कालचक्रमें ग्रह, नक्षत्र और तारागणकी स्थितिका भी अलग-अलग वर्णन कीजिये॥ ३२-३३॥