श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

पुरुषस्य च संस्थानं स्वरूपं वा परस्य च।

ज्ञानं च नैगमं यत्तद‍्गुरुशिष्यप्रयोजनम्॥ ३८

puruṣasya ca saṃsthānaṃ svarūpaṃ vā parasya ca|

jñānaṃ ca naigamaṃ yattadguruśiṣyaprayojanam|| 38

अर्थ

जीवका तत्त्व, परमेश्‍वरका स्वरूप, उपनिषत्-प्रतिपादित ज्ञान तथा गुरु और शिष्यका पारस्परिक प्रयोजन क्या है?॥ ३८॥

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