॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.7.40
एतान्मे पृच्छतः प्रश्नान् हरेः कर्मविवित्सया।
ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुषः॥ ४०
etānme pṛcchataḥ praśnān hareḥ karmavivitsayā|
brūhi me'jñasya mitratvādajayā naṣṭacakṣuṣaḥ|| 40
अर्थ
ब्रह्मन्! माया-मोहके कारण मेरी विचारदृष्टि नष्ट हो गयी है। मैं अज्ञ हूँ, आप मेरे परम सुहृद् हैं; अतः श्रीहरिलीलाका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे मैंने जो प्रश्न किये हैं, उनका उत्तर मुझे दीजिये॥ ४०॥