श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब कुरुश्रेष्ठ विदुरजीने मुनिवर मैत्रेयजीसे इस प्रकार पुराणविषयक प्रश्न किये, तब भगवच्चर्चाके लिये प्रेरित किये जानेके कारण वे बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराकर उनसे कहने लगे॥ ४२॥✎ 1587
स इत्थमापृष्टपुराणकल्पः
कुरुप्रधानेन मुनिप्रधानः।
प्रवृद्धहर्षो भगवत्कथायां
सञ्चोदितस्तं प्रहसन्निवाह॥ ४२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब कुरुश्रेष्ठ विदुरजीने मुनिवर मैत्रेयजीसे इस प्रकार पुराणविषयक प्रश्न किये, तब भगवच्चर्चाके लिये प्रेरित किये जानेके कारण वे बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराकर उनसे कहने लगे॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 267) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)