श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक-

पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् ।

अव्यक्तमूलं भुवनाङ्‌घ्रिपेन्द्र-

महीन्द्रभोगैरधिवीतवल्शम् ॥ २९

parārghyakeyūramaṇipraveka-

paryastadordaṇḍasahasraśākham |

avyaktamūlaṃ bhuvanāṅghripendra-

mahīndrabhogairadhivītavalśam || 29

अर्थ

वे अव्यक्तमूल चन्दनवृक्षके समान हैं। महामूल्य केयूर और उत्तम-उत्तम मणियोंसे सुशोभित उनके विशाल भुजदण्ड ही मानो उसकी सहस्रों शाखाएँ हैं और चन्दनके वृक्षोंमें जैसे बड़े-बड़े साँप लिपटे रहते हैं, उसी प्रकार उनके कंधोंको शेषजीके फणोंने लपेट रखा है॥ २९॥

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