श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

त्वं भावयोगपरिभावितहृत्सरोज

आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्।

यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति

तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय४॥ ११

tvaṃ bhāvayogaparibhāvitahṛtsaroja

āsse śrutekṣitapatho nanu nātha puṃsām|

yadyaddhiyā ta urugāya vibhāvayanti

tattadvapuḥ praṇayase sadanugrahāya|| 11

अर्थ

नाथ! आपका मार्ग केवल गुणश्रवणसे ही जाना जाता है। आप निश्‍चय ही मनुष्योंके भक्तियोगके द्वारा परिशुद्ध हुए हृदयकमलमें निवास करते हैं। पुण्यश्लोक प्रभो! आपके भक्तजन जिस-जिस भावनासे आपका चिन्तन करते हैं, उन साधु पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये आप वही-वही रूप धारण कर लेते हैं॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—तदनुग्रहाय।

    (मुद्रित पृष्ठ 273)

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