॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.14
शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद-
मोहाय बोधधिषणाय१ नमः परस्मै।
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला-
रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय॥ १४
śaśvatsvarūpamahasaiva nipītabheda-
mohāya bodhadhiṣaṇāya namaḥ parasmai|
viśvodbhavasthitilayeṣu nimittalīlā-
rāsāya te nama idaṃ cakṛmeśvarāya|| 14
अर्थ
आप सर्वदा अपने स्वरूपके प्रकाशसे ही प्राणियोंके भेद-भ्रमरूप अन्धकारका नाश करते रहते हैं तथा ज्ञानके अधिष्ठान साक्षात् परमपुरुष हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके निमित्तसे जो मायाकी लीला होती है, वह आपका ही खेल है; अतः आप परमेश्वरको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १४॥✎ 238
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—बोधविषयाय।