॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.16
यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च
स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलम्।
भित्त्वा त्रिपाद्ववृध एक उरुप्ररोह-
स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय॥ १६
yo vā ahaṃ ca giriśaśca vibhuḥ svayaṃ ca
sthityudbhavapralayahetava ātmamūlam|
bhittvā tripādvavṛdha eka urupraroha-
stasmai namo bhagavate bhuvanadrumāya|| 16
अर्थ
भगवन्! इस विश्ववृक्षके रूपमें आप ही विराजमान हैं। आप ही अपनी मूलप्रकृतिको स्वीकार करके जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिये मेरे, अपने और महादेवजीके रूपमें तीन प्रधान शाखाओंमें विभक्त हुए हैं और फिर प्रजापति एवं मनु आदि शाखा-प्रशाखाओंके रूपमें फैलकर बहुत विस्तृत हो गये हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥✎ 238