ब्रह्माजी! नाना प्रकारके कर्मसंस्कारोंके अनुसार अनेक प्रकारकी जीवसृष्टिको रचनेकी इच्छा होनेपर भी तुम्हारा चित्त मोहित नहीं होता, यह मेरी अतिशय कृपाका ही फल है॥ ३४॥
नानाकर्मवितानेन प्रजा बह्वीः सिसृक्षतः।
नात्मावसीदत्यस्मिंस्ते वर्षीयान्मदनुग्रहः॥ ३४
ब्रह्माजी! नाना प्रकारके कर्मसंस्कारोंके अनुसार अनेक प्रकारकी जीवसृष्टिको रचनेकी इच्छा होनेपर भी तुम्हारा चित्त मोहित नहीं होता, यह मेरी अतिशय कृपाका ही फल है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.9.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 277) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/9/34/