॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.41
पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगसमाधिना।
राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ६॥ ४१
pūrtena tapasā yajñairdānairyogasamādhinā|
rāddhaṃ niḥśreyasaṃ puṃsāṃ matprītistattvavinmatam || 41
अर्थ
तत्त्ववेत्ताओंका मत है कि पूर्त, तप, यज्ञ, दान, योग और समाधि आदि साधनोंसे प्राप्त होनेवाला जो परम कल्याणमय फल है, वह मेरी प्रसन्नता ही है॥ ४१॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मता।