वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था। उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी॥ १८॥
तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने।
वार्भिःस्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः॥ १८
वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था। उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 407) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/1/18/