श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आकूतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृपः।

पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदितः॥ २

ākūtiṃ rucaye prādādapi bhrātṛmatīṃ nṛpaḥ|

putrikādharmamāśritya śatarūpānumoditaḥ|| 2

अर्थ

आकूतिका, यद्यपि उसके भाई थे तो भी, महारानी शतरूपाकी अनुमतिसे उन्होंने रुचि प्रजापतिके साथ ‘पुत्रिकाधर्म’-के* अनुसार विवाह किया॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    ‘पुत्रिकाधर्म’ के अनुसार किये जानेवाले विवाहमें यह शर्त होती है कि कन्याके जो पहला पुत्र होगा, उसे कन्याके पिता ले लेंगे।

    (मुद्रित पृष्ठ 405)

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