उन्हें इस प्रकार अभीष्ट वर देकर तथा पति-पत्नी दोनोंसे भलीभाँति पूजित होकर उनके देखते-ही-देखते वे तीनों सुरेश्वर अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३२॥
एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्वराः।
सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः॥ ३२
उन्हें इस प्रकार अभीष्ट वर देकर तथा पति-पत्नी दोनोंसे भलीभाँति पूजित होकर उनके देखते-ही-देखते वे तीनों सुरेश्वर अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 408) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/32/