श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.56

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

देवा ऊचुः

यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं

खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय।

एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य

प्रादुश्‍चकार पुरुषाय नमः परस्मै॥ ५६

yo māyayā viracitaṃ nijayā''tmanīdaṃ

khe rūpabhedamiva tatpraticakṣaṇāya|

etena dharmasadane ṛṣimūrtinādya

prāduścakāra puruṣāya namaḥ parasmai|| 56

अर्थ

देवताओंने कहा—जिस प्रकार आकाशमें तरह-तरहके रूपोंकी कल्पना कर ली जाती है—उसी प्रकार जिन्होंने अपनी मायाके द्वारा अपने ही स्वरूपके अन्दर इस संसारकी रचना की है और अपने उस स्वरूपको प्रकाशित करनेके लिये इस समय इस ऋषि-विग्रहके साथ धर्मके घरमें अपने-आपको प्रकट किया है, उन परम पुरुषको हमारा नमस्कार है॥ ५६॥

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