यक्षलोग अपनी विजयकी घोषणा करते हुए युद्धक्षेत्रमें सिंहकी तरह गरजने लगे। इसी बीचमें ध्रुवजीका रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरेमेंसे सूर्यभगवान् निकल आते हैं॥ १५॥
नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे।
उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्करः॥ १५
यक्षलोग अपनी विजयकी घोषणा करते हुए युद्धक्षेत्रमें सिंहकी तरह गरजने लगे। इसी बीचमें ध्रुवजीका रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरेमेंसे सूर्यभगवान् निकल आते हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 462) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/10/15/