उनके धनुषसे छूटे हुए तीखे तीर यक्ष-राक्षसोंके कवचोंको भेदकर इस प्रकार उनके शरीरोंमें घुस गये, जैसे इन्द्रके छोड़े हुए वज्र पर्वतोंमें प्रवेश कर गये थे॥ १७॥
तस्य ते चापनिर्मुक्ता भित्त्वा वर्माणि रक्षसाम्।
कायानाविविशुस्तिग्मा गिरीनशनयो यथा॥ १७
उनके धनुषसे छूटे हुए तीखे तीर यक्ष-राक्षसोंके कवचोंको भेदकर इस प्रकार उनके शरीरोंमें घुस गये, जैसे इन्द्रके छोड़े हुए वज्र पर्वतोंमें प्रवेश कर गये थे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 462) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/17/