उन सभीने जब अपने-अपने मस्तकोंमें तीन-तीन बाण लगे देखे, तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि हमारी हार अवश्य होगी। वे ध्रुवजीके इस अद्भुत पराक्रमकी प्रशंसा करने लगे॥ ९॥
ते वै ललाटलग्नैस्तैरिषुभिः सर्व एव हि।
मत्वा निरस्तमात्मानमाशंसन् कर्म तस्य तत्॥ ९
उन सभीने जब अपने-अपने मस्तकोंमें तीन-तीन बाण लगे देखे, तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि हमारी हार अवश्य होगी। वे ध्रुवजीके इस अद्भुत पराक्रमकी प्रशंसा करने लगे॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/9/