श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स खल्विदं भगवान् कालशक्‍त्या

गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः।

करोत्यकर्तैव निहन्त्यहन्ता

चेष्टा विभूम्नः खलु दुर्विभाव्या॥ १८

sa khalvidaṃ bhagavān kālaśaktyā

guṇapravāheṇa vibhaktavīryaḥ|

karotyakartaiva nihantyahantā

ceṣṭā vibhūmnaḥ khalu durvibhāvyā|| 18

अर्थ

काल-शक्तिके द्वारा क्रमशः सत्त्वादि गुणोंमें क्षोभ होनेसे लीलामय भगवान्‌की शक्ति भी सृष्टि आदिके रूपमें विभक्त हो जाती है; अतः भगवान् अकर्ता होकर भी जगत‍्की रचना करते हैं और संहार करनेवाले न होकर भी इसका संहार करते हैं। सचमुच उन अनन्त प्रभुकी लीला सर्वथा अचिन्तनीय है॥ १८॥✎ 379 380

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #379 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #380 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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