श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

आयुषोऽपचयं जन्तोस्तथैवोपचयं विभुः।

उभाभ्यां रहितः स्वस्थो दुःस्थस्य विदधात्यसौ॥ २१

āyuṣo'pacayaṃ jantostathaivopacayaṃ vibhuḥ|

ubhābhyāṃ rahitaḥ svastho duḥsthasya vidadhātyasau|| 21

अर्थ

सर्वसमर्थ श्रीहरि कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी आयुकी वृद्धि और क्षयका विधान करते हैं, परन्तु वे स्वयं इन दोनोंसे रहित और अपने स्वरूपमें स्थित हैं॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें