na vai cikīrṣitaṃ tāta ko vedātha svasambhavam|| 23
अर्थ
वे किसी भी इन्द्रिय या प्रमाणके विषय नहीं हैं। महदादि अनेक शक्तियाँ भी उन्हींसे प्रकट हुई हैं। वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी संसारमें कोई नहीं जानता; फिर अपने मूल कारण उन प्रभुको तो जान ही कौन सकता है॥ २३॥
अव्यक्तस्याप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च।
न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ स्वसम्भवम्॥ २३
वे किसी भी इन्द्रिय या प्रमाणके विषय नहीं हैं। महदादि अनेक शक्तियाँ भी उन्हींसे प्रकट हुई हैं। वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी संसारमें कोई नहीं जानता; फिर अपने मूल कारण उन प्रभुको तो जान ही कौन सकता है॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 466) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/23/