एकमात्र वही संसारको रचता, पालता और नष्ट करता है, किन्तु अहंकारशून्य होनेके कारण इसके गुण और कर्मोंसे वह सदा निर्लेप रहता है॥ २५॥✎ 381
स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च।
अथापि ह्यनहंकारान्नाज्यते गुणकर्मभिः॥ २५
एकमात्र वही संसारको रचता, पालता और नष्ट करता है, किन्तु अहंकारशून्य होनेके कारण इसके गुण और कर्मोंसे वह सदा निर्लेप रहता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 466) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)