श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यः पंचवर्षो जननीं त्वं विहाय

मातुः सपत्न्या वचसा भिन्‍नमर्मा।

वनं गतस्तपसा प्रत्यगक्ष-

माराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्याः॥ २८

yaḥ paṃcavarṣo jananīṃ tvaṃ vihāya

mātuḥ sapatnyā vacasā bhinnamarmā|

vanaṃ gatastapasā pratyagakṣa-

mārādhya lebhe mūrdhni padaṃ trilokyāḥ|| 28

अर्थ

तुम पाँच वर्षकी ही अवस्थामें अपनी सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर माँकी गोद छोड़कर वनको चले गये थे। वहाँ तपस्याद्वारा जिन हृषीकेश भगवान्‌की आराधना करके तुमने त्रिलोकीसे ऊपर ध्रुवपद प्राप्त किया है और जो तुम्हारे वैरभावहीन सरल हृदयमें वात्सल्यवश विशेषरूपसे विराजमान हुए थे, उन निर्गुण अद्वितीय अविनाशी और नित्यमुक्त परमात्माको अध्यात्मदृष्टिसे अपने अन्तःकरणमें ढूँढ़ो। उनमें यह भेदभावमय प्रपंच न होनेपर भी प्रतीत हो रहा है॥ २८-२९॥✎ 381

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #381 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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