जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुवने इसी तरह अर्थ, धर्म और कामके सम्पादनमें बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कलको राजसिंहासन सौंप दिया॥ १४॥
एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः।
त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्नृपासनम्॥ १४
जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुवने इसी तरह अर्थ, धर्म और कामके सम्पादनमें बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कलको राजसिंहासन सौंप दिया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 469) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/14/