श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश-

मन्तःपुरं परिविहारभुवश्‍च रम्याः।

भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य

कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम्॥ १६

ātmastryapatyasuhṛdo balamṛddhakośa-

mantaḥpuraṃ parivihārabhuvaśca ramyāḥ|

bhūmaṇḍalaṃ jaladhimekhalamākalayya

kālopasṛṣṭamiti sa prayayau viśālām|| 16

अर्थ

इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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