श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्‍नजस्र-

मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः।

विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो

नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिंगः॥ १८

bhaktiṃ harau bhagavati pravahannajasra-

mānandabāṣpakalayā muhurardyamānaḥ|

viklidyamānahṛdayaḥ pulakācitāṅgo

nātmānamasmaradasāviti muktaliṃgaḥ|| 18

अर्थ

इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके प्रति निरन्तर भक्तिभावका प्रवाह चलते रहनेसे उनके नेत्रोंमें बार-बार आनन्दाश्रुओंकी बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीरमें रोमांच हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जानेसे उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही॥ १८॥✎ 1324 1325

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1324 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विराट्-रूपका → विराट्रूपका
  • #1325 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विराट्-रूपका → विराट्रूपका

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