॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.25
सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया
यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम्।
आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो
ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम्॥ २५
sudurjayaṃ viṣṇupadaṃ jitaṃ tvayā
yatsūrayo'prāpya vicakṣate param|
ātiṣṭha taccandradivākarādayo
graharkṣatārāḥ pariyanti dakṣiṇam|| 25
अर्थ
आपने अपनी भक्तिके प्रभावसे विष्णुलोकका अधिकार प्राप्त किया है, जो औरोंके लिये बड़ा दुर्लभ है। परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँतक नहीं पहुँच सके, वे नीचेसे केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाममें निवास कीजिये॥ २५॥✎ 382 1326